कानून व्यवस्था का भार और पुलिस की सीमाएँ
हर आयोजन की सफलता के पीछे पुलिस की अनकही कहानी
किसी भी बड़े आयोजन—चाहे वह धार्मिक हो, सांस्कृतिक हो या राजकीय—की सफलता का सबसे मौन, सबसे अनदेखा योगदान पुलिस का होता है। मंच पर जहां उत्सव का माहौल होता है, वहीं पर्दे के पीछे पूरी व्यवस्था को संभालने का भार पुलिस के कंधों पर होता है। भीड़, यातायात, सुरक्षा और अनुशासन—इन चारों का संतुलन बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं होता।
हाल ही में ग्राम घुघरीखुर्द, जिला कबीरधाम में आयोजित पंडित प्रदीप मिश्रा जी की शिवपुराण कथा इसका उत्कृष्ट उदाहरण रही। प्रसिद्ध कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जी के प्रवचनों में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ रही, पर पूरी कथा अवधि में पुलिस की व्यवस्था न केवल अनुशासित रही बल्कि श्रद्धालुओं ने भी अत्यंत शांति और सहजता का अनुभव किया। कथा मंच से ही पंडित प्रदीप मिश्रा जी ने कबीरधाम पुलिस की सराहना करते हुए कहा कि इतने बड़े आयोजन में बिना किसी अव्यवस्था के सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना अत्यंत सराहनीय है।
किन्तु इस सफलता के पीछे जो कठिन परिश्रम, धैर्य और संघर्ष रहा, वह बहुत कम लोग देख पाए। पुलिस ने दिन-रात ड्यूटी निभाई, न भोजन का निश्चित समय रहा, न विश्राम का अवसर। भीड़ में अनेक बार ऐसे लोग भी थे जो बिना अनुमति या पास के मंच क्षेत्र या आरक्षित मार्ग में प्रवेश करना चाहते थे। कई बार तथाकथित प्रभावशाली व्यक्ति, पत्रकार या स्थानीय नेता यह तर्क देते हुए आगे बढ़ना चाहते थे कि उन्हें कोई विशेष छूट मिलनी चाहिए। जब पुलिस ने नियमों के अनुसार उन्हें रोका, तो उसी समय बहस, अपमानजनक टिप्पणी और दबाव की स्थिति बनी। बावजूद इसके पुलिसकर्मी संयमित रहे, ताकि आयोजन का माहौल प्रभावित न हो।
इन्हीं परिस्थितियों में एक और दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग यह रहा कि कुछ तथाकथित वेब पोर्टल संचालकों ने पुलिस व्यवस्था को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया। ये वे लोग थे जो न तो आयोजन के अनुशासन को समझते हैं, न सुरक्षा की गंभीरता को। एक मौके पर उन्होंने पुलिसकर्मियों से इतना विवाद किया कि कोई और होता तो स्थिति हाथ से निकल सकती थी। कथा में जिस दिन लगभग 1 लाख से अधिक लोग आये थे उस दिन पुलिस द्वारा बिना पासधारी व्यक्तियों को प्रवेश देने से सख्त मना कर दिया गया पर एक तथाकथित वेब पोर्टल संचालक ने अंदर जाने के लिए लगातार पुलिस जवानों के साथ बहस और दुर्व्यवहार करता रहा. उसके द्वारा ये तर्क दिया जाता रहा की वह कवरेज करने आया है पर क्या कोई पत्रकार अपने परिवार के 10 लोगों को साथ लेकर बिना वैध पास के कवरेज करने आ सकता है और क्या उसे बिना पास के अन्दर जाने देना सही है ? नहीं, पर इसके बावजूद तथाकथित पत्रकार के द्वारा विवाद किया जाता रहा. इसी दौरान एक पुलिस परिवार के सदस्य, जिनके पास वैध प्रवेश-पास था, जिसे पुलिस जवान एंट्उरी देने जा रहे थे इस सम्भ्रान्त पत्रकार के द्वारा यह कहकर विवाद करते हुए विडिओ बनाने लगा की देखते हैं पुलिस वाले अपने परिवार को कैसे एंट्री देते हैं उसकी जिद और अहंकार के चलते बेचारे परिवार के पास वैध पास होने के बावजूद पुलिस ने प्रवेश से वंचित कर दिया सोचिये क्या बीती होगी उस परिवार पर और उस कर्मचारी पर जिसका परिवार था ? पुलिस ने मर्यादा और संयम के कारण कोई कठोर कदम नहीं उठाया, पर उस परिवार के सदस्य की पीड़ा और अपमान उस क्षण सभी संवेदनशील लोगों ने महसूस किया। ऐसे प्रसंग केवल मन को नहीं, व्यवस्था के ताने-बाने को भी घायल करते हैं।
यह समस्या केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं। राज्योत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और वीआईपी यात्राओं में भी यही दृश्य देखने को मिलता है। कई लोग निर्धारित पार्किंग से आगे वाहन ले जाने की जिद करते हैं, नो-पार्किंग क्षेत्र में गाड़ियाँ खड़ी करते हैं या आरक्षित वीआईपी रूट पर जबरन प्रवेश का प्रयास करते हैं। जब पुलिस रोकती है तो उसे “कठोर” कहा जाता है, और जब वह अनुमति देती है तो जाम, भीड़ और अव्यवस्था के लिए वही पुलिस जिम्मेदार ठहराई जाती है। कई अवसरों पर तो मुख्य मंच पर आमंत्रित अतिथियों के लिए नामित कुर्सियों पर बैठना चाहते हैं और बताने पर ऐसे आंख तरेरते हैं मनो उनको वहां न बैठने के लिए नहीं बल्कि उनकी किडनी मांग ली गयी हो.
इन्हीं विरोधाभासों के बीच पुलिस अपना कर्तव्य निभाती है। उसका स्वर कभी ऊँचा हो जाए तो “दुर्व्यवहार” का आरोप लग जाता है, पर जब कोई नागरिक पुलिस से दुर्व्यवहार करता है, तो उसकी गलती को समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। सच यह है कि वर्दी में होने के कारण पुलिसकर्मी की छोटी-सी प्रतिक्रिया भी सबको दिख जाती है, पर उससे पहले जो अपमान, उकसावा और दबाव झेलना पड़ा होता है, वह कोई नहीं देखता।
कवर्राधा में राज्योत्सव के दौरान हुई हालिया घटना इसका उदाहरण है। नशे में धुत एक युवा कार्युयकर्वता ने सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम के दौरान न केवल उत्पात मचाया बल्कि थाना प्रभारी को मां बहन की गालियाँ तक दीं। जब पुलिस ने संयम खोए बिना उसे रोकने की कोशिश की, तब वहीं मौजूद एक प्रभावशाली व्यक्ति ने भी युवक की गलती पर ध्यान देने के बजाय पुलिस अधिकारी से ही बहस शुरू कर दी और पुलिस अधिकारी के साथ खुद भी गाली गलौच शुरू कर दी । सोशल मीडिया में विडिओ वायरल होने के बावजूद पुलिस पर कार्आयवाही ना करने का बहुत रहा होगा इसके बावजूद आखिरकार पुलिस ने कानूनी कार्यवाही करते हुए उस युवक पर FIR दर्ज की, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण उसकी गिरफ्तारी आज तक नहीं हो सकी। यही व्यक्ति पूर्व में भी सार्वजनिक रूप से मारपीट कर चुका है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था, फिर भी उस पर कार्रवाई नहीं हो पाई।
ऐसी परिस्थितियाँ पुलिस के मनोबल पर गहरा असर डालती हैं। जब समाज का एक वर्ग नियम तोड़ता है, पुलिस से भिड़ता है और फिर राजनीतिक संरक्षण में बच निकलता है, तो यह न केवल पुलिस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाता है, बल्कि कानून व्यवस्था की नींव को भी कमजोर करता है।
पुलिस पर कार्रवाई न करने का दबाव अक्सर कई दिशाओं से आता है। कभी नेता या जनप्रतिनिधि कहते हैं कि किसी का चालान न काटा जाए, जुआ या शराब के मामलों में पकड़े गए लोगों को जेल न भेजा जाए, तो कभी प्रभावशाली व्यक्ति अपने समर्थकों को बचाने के लिए फोन पर दबाव बनाते हैं। कई बार ऊपरी अधिकारियों या प्रशासनिक स्तर से भी संकेत मिलते हैं कि किसी विशेष व्यक्ति या समूह पर कार्रवाई न की जाए।
कुछ मामलों में यह दबाव इस रूप में भी आता है कि यदि पुलिस इन दबावों को न माने तो उन पर इल्जाम लगते हैं — “पुलिस ने पैसे लिए” या “रिश्वत मांगी” जैसी शिकायतें तेज़ी से फैल जाती हैं। ऐसे आरोप लगाना आसान होता है और वे शक्ति-संपन्न लोगों के लिए एक तरीका बन जाते हैं जिससे वे कार्रवाई रोकने की कोशिश करते हैं।
इसके अलावा कुछ तथाकथित पत्रकार या वेब-पोर्टल संचालक जिनका उद्देश्य केवल चंदा वसूली करना होता है मौके पर पहुँचकर माहौल भड़काते हैं, वीडियो बनाते हैं और सोशल मीडिया पर गलत धारणा फैलाते हैं, जिससे दबाव और बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप पुलिस की कार्रवाई टल जाती है, जबकि अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं।
ट्रैफिक चालान न काटने, अवैध शराब या जुए के मामलों में कार्रवाई न करने जैसी स्थितियाँ रोज़ देखने को मिलती हैं। इन सबका सबसे बड़ा नुकसान कानून के शासन और जनता के विश्वास को होता है। ऐसी परिस्थितियाँ न केवल पुलिस के मनोबल को तोड़ती हैं बल्कि ईमानदार कार्यशैली के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती हैं।
फिर भी पुलिस हर बार यही साबित करती है कि वह व्यवस्था के लिए बनी है, बदले के लिए नहीं। उसका धैर्य और संयम ही उसकी पहचान है। पर यह भी सच है कि यदि समाज लगातार इस धैर्य की परीक्षा लेता रहेगा, तो एक समय ऐसा भी आएगा जब पुलिस को मजबूरन सख्त रुख अपनाना पड़ेगा—और तब वही लोग जो आज नियम तोड़ते हैं, कल शिकायत करते दिखेंगे।
आज आवश्यकता है कि नागरिक, आयोजक, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व—सभी यह समझें कि अनुशासन किसी का अपमान नहीं, बल्कि सुरक्षा का आश्वासन है। पुलिस जब रोकती है तो वह व्यक्तिगत द्वेष से नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित से प्रेरित होती है। हर नागरिक यदि यही सोच रखे तो न केवल आयोजन बेहतर होंगे, बल्कि पुलिस और समाज के बीच परस्पर सम्मान भी बढ़ेगा।
हर कार्यक्रम की सफलता केवल मंच की रोशनी या भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उन वर्दीधारी कर्मियों के धैर्य, अनुशासन और सेवा से मापी जाती है जो सुबह से रात तक सबकी सुरक्षा में लगे रहते हैं, अक्सर बिना किसी प्रशंसा के, बिना किसी विराम के।
अब वक्त है कि हम पुलिस को सिर्फ एक “बल” नहीं, बल्कि “सहयोगी संस्था” के रूप में देखें—क्योंकि जब समाज पुलिस का साथ देता है, तभी कानून व्यवस्था सुदृढ़ होती है और सुरक्षा सुनिश्चित होती है।


