छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में पदोन्नति को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। भारतीय पुलिस सेवा 2012 बैच के अधिकारी एवं कवर्धा के पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह छवई ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर जिस पीड़ा और आक्रोश को शब्दों में उतारा है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ईमानदारी अब सिस्टम में सबसे बड़ी सजा बनती जा रही है।मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में अधिकारी ने साफ तौर पर आरोप लगाया है कि सभी नियमों, पात्रता और सेवा रिकॉर्ड के बावजूद उन्हें जानबूझकर पदोन्नति से वंचित किया गया। पुलिस मुख्यालय द्वारा अलग-अलग तारीखों में जारी की गई पदोन्नति सूचियों में उनका नाम शामिल होने के बाद भी हर बार उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। वजह बताई गई कि उनके विरुद्ध लोकायुक्त संगठन, भोपाल में एक जांच लंबित है, जबकि हकीकत यह है कि न तो उनके खिलाफ चार्जशीट है, न कोई विभागीय जांच और न ही किसी तरह का निलंबन।
अधिकारी का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब वे यह बताते हैं कि जिन अधिकारियों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज हैं और जिन मामलों में अदालतों से अंतिम रिपोर्ट तक नहीं आई है, उन्हें न सिर्फ पदोन्नत किया गया बल्कि महत्वपूर्ण पदों पर भी बैठा दिया गया। वहीं एक ऐसा अधिकारी, जिसकी सेवा पर अब तक कोई दाग नहीं है, उसे केवल संदेह के आधार पर पीछे धकेल दिया गया।
पत्र में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 1999 में जारी पदोन्नति नियमों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि कोई अधिकारी निलंबित नहीं है, उसके विरुद्ध आरोप पत्र जारी नहीं हुआ है और कोई आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित नहीं है, तो उसे पदोन्नति से रोका नहीं जा सकता। इसके बावजूद वरिष्ठ वेतनमान और उप पुलिस महानिरीक्षक जैसे महत्वपूर्ण पद से उन्हें दूर रखना नियमों के साथ-साथ न्याय की भावना का भी अपमान माना जा रहा है।
पुलिस अधीक्षक ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत समान अवसर के अधिकार का खुला उल्लंघन बताया है। उनका कहना है कि समान परिस्थितियों में कार्यरत अधिकारियों को आगे बढ़ाया गया, जबकि उनके साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया। इस व्यवहार से न केवल उनका मनोबल टूटा है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि सिस्टम में ईमानदारी और निष्पक्षता की कोई कीमत नहीं रह गई है।
इस पत्र के सार्वजनिक होने के बाद पुलिस विभाग में अंदरखाने हलचल तेज हो गई है। सवाल यह नहीं है कि एक अधिकारी को पदोन्नति क्यों नहीं मिली, सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ पुलिस में पदोन्नति का पैमाना अब योग्यता नहीं, बल्कि पसंद और दबाव बनता जा रहा है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें मुख्यमंत्री और राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर और संवेदनशील मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या एक ईमानदार अधिकारी को वास्तव में न्याय मिल पाता है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।